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December, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लकीर का फकीर

एक कवि एक सुंदर बाग के एकांत में सरोवर तट पर एक लंबे घने वृक्ष के नीचे बैठा कविता लिख रहा था। आसपास कोई भी नहीं था। एक कोवा वृक्ष की डाल पर बैठा था। कवि अपनी पहली कविता कहता है : सारी दुनिया की संपत्ति का मैं मालिक सोलोमन का खजाना भी मैंने पा लिया कुबेर का खजाना भी मैंने पा लिया
ऊपर बैठा कौवा कांव-कांव करता है और कहता है “सो व्हॉट? , इससे क्या हुआ? कवि बहुत हैरान हुआ। कवि कह रहा है मैं कुबेर हो गया,सारी संपत्ति मेरी हो गई और कौवा कह रहा है सो व्हॉट? कवि ने क्रोध में ऊपर देखा, और कहा,” ना समझ कौवे तू क्या समझेगा?” कौवे ने कहा, ठीक कहते हैं आप, धन की बात कोई दूसरा कौवा भी नहीं समझेगा। धन की बात सिवाए आदमी के कोई भी नहीं समझेगा। ना कोई विश्वास करेगा।“ लेकिन तुम समझते हो कि हम धन की बात नहीं समझते, इसलिए ना समझ हैं। तो यह बात नहीं है। सच बात तो ये है कि हम किसी चीज को बिना खोजे विश्वास नहीं करते। कवि ने कहा , ठीक है, तुम्हें विश्वास नहीं आता तो दूसरी कविता सुनाता हूं :- सारी पृथ्वी का राज्य मैंने पाया चक्रवर्ती सम्राट मैं कहलाया स्वर्ण सिंहासनों पर विराजा मैं सब कुछ मैं हूं

सिटनालटा

एक बार विद्वान लोगों के एक समूह ने ओशो को बोलने के लिए आमंत्रित किया। ओशो ने आमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया और नियत दिन सभा को संबोधित करने पहुंचे। ओशो ने इस समूह के साथ चर्चा का जो विषय चुना वह था : "सिटनालटा- एक अनोखा समाज"। उन्होंने उस समाज के संबंध में बोलते हुआ कहा कि हमारे शरीर में सात चक्र नहीं,बल्कि सत्रह चक्र होते हैं। सिटनालटा समाज ने यह खोज निकाला था। यह पुरातन विद्या अब लुप्त हो गई है। लेकिन निर्वाणप्राप्त 'सिटनालटा' के इस इस गुप्त,गुह्य रहस्य को जानने वालों की एक गुप्त संस्था आज भी सक्रिय है। इन लोगों को जीवन के सभी रहस्यों का पता है। उनके पास ऐसी-ऐसी शक्तियां हैं,जिनकी सामान्य लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। सभा के अंत में सभापति ओशो से बोले कि उन्हें सिटनालटा के बारे में पता है। एक और व्यक्ति आकर कहने लगा कि वह सिटनालटा का सदस्य है। फिर उनके पास पत्र आने लगे उन लोगों के जो दावा करते थे कि वे भी उस रहस्यमयी संस्था के सदस्य हैं। ओशो मन ही मन हंसे,क्योंकि सत्य तो यह था कि भाषण से पहले ओशो एटलांटिस नामक महाद्विप के बारे में पढ़ रहे थे। ऐसा माना जाता है कि यह महाद्…